Wednesday, 5 May 2021

बहरे शाह वज़ीर

 


हवा विषैली हर तरफ़, मचा रही उत्पात।
क्रूर काल पहुँचा रहा, अंतस् को आघात।।
 
महामारी विकट हुई, बनी गले की फाँस।
हाँफ रही है ज़िंदगी, उखड़ रही है सांस।।

चूक आकलन में हुई, मचा हुआ कुहराम।
हाल बुरा है देखिए, सिस्टम है नाकाम।।
 
सत्ता पाने के लिए, नेता हुए अधीर।
कोरोना का भय नहीं, घूम रहे हैं वीर।।
 
बस चुनाव की फ़िक्र में, शासक हैं मशगूल।
हर दिन ही वो तोड़ते, अपने नियम उसूल।।
 
मतलब अपना साध कर, बैठे आँखें फेर।
कैसे बचे यकीन अब, चारों ओर अँधेर।।

त्राहि-त्राहि हर ओर है, सुने न कोई पीर।
सत्ता बहरी हो गई, बहरे शाह वज़ीर।।
 
प्राण-वायु को रोक कर, क़ीमत रहे वसूल।
ज़हर बाँटते जो रहे, उनसे आस फ़ुज़ूल।।

                                                                © हिमकर श्याम

                                                              (चित्र गूगल से साभार)

                                                                      
                                                                     

10 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 07-05-2021) को
    "विहान आयेगा"(चर्चा अंक-4058)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित है.धन्यवाद

    "मीना भारद्वाज"

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  3. महामारी का भीषण रूप दिखाई दे रहा है, लेकिन हर रात की सुबह होती है

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  4. सार्थक संदर्भ उठाते दोहे ।

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  5. आज के हालात का उचित वर्णन करते दोहे....आभार....

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  6. आज का यथार्थ दिखाती सुंदर रचना।

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  7. सटीक और सामयिक दोहे...
    करोना काल का बाखूबी चित्रण है इन दोहों में ...

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  8. आज का सन्दर्भ व्यक्त करती सुन्दर रचना!

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