Wednesday, 22 May 2019

लिख रहे कैसी कहानी मुल्क में


लिख रहे कैसी कहानी मुल्क में
कर रहे जो हुक्मरानी मुल्क में

क़द्र खोती ये सियासत देखिए
आम होती बदजुबानी मुल्क में

मुफ़लिसी, बेरोजगारी बढ़ रही
रक़्स करती ख़ुश-गुमानी मुल्क में

अब भरोसा उठ गया है न्याय से
हाए इकतर्फ़ा बयानी मुल्क में

ख़ौफ़  का माहौल ऐसा बन गया
अब न होती हक़ बयानी मुल्क में

आँख से पट्टी हटा कर देखिए
क्या फ़ज़ाएँ शादमानी मुल्क में


कम नहीं हैं ज़ीस्त की दुश्वारियाँ  
आफ़तें कितनी उठानी मुल्क में

प्यार कितना है वतन से बोलिए
चाहिए इसकी निशानी मुल्क में

© हिमकर श्याम



(चित्र गूगल से साभार)



17 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23-05-19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3344 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 22/05/2019 की बुलेटिन, " EVM पर निशाना किस लिए - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete
  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (24-05-2019) को "आम होती बदजुबानी मुल्क में" (चर्चा अंक- 3345) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  5. प्रशंसनीय.....

    ReplyDelete
  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार मई 24, 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  7. वाह!!!
    बहुत सुन्दर... सराहनीय
    मुफ़लिसी, बेरोजगारी बढ़ रही
    रक़्स करती ख़ुश-गुमानी मुल्क में

    ReplyDelete
  8. बहुत खरी-खरी बात हिमकर श्याम जी ! पर मेरी दोस्ताना सलाह -
    मुल्क में महफ़ूज़ रहने के लिए,
    तुम ज़ुबां, ताले में रखना सीख लो.
    जल में रहना है, तो फिर घड़ियाल की
    आरती, दिन-रात करना सीख लो.

    ReplyDelete
  9. बहुत ख़ूब आदरणीय
    सादर

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर प्रस्तूति, हिमकर जी।

    ReplyDelete
  11. वाह!!बहुत खूब!

    ReplyDelete
  12. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  13. बहुत खूब ...
    हर शेर एक निशाना है आज के समाज पर, सत्ता पर ...
    बहुत लाजवाब ग़ज़ल ...

    ReplyDelete
  14. एहसासों को बखूबी पिरोया है आपने।

    ReplyDelete

आपके विचारों एवं सुझावों का स्वागत है. टिप्पणियों को यहां पर प्रकट व प्रदर्शित होने में कुछ समय लग सकता है.