Friday, 3 November 2017

सब्र किस दर्जा काम आता है

[आज इस 'ब्लॉग' के चार वर्ष पूरे हो गए। इन चार वर्षों में आप लोगों का जो स्नेह और सहयोग मिला, उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया और आभार। यूँही आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे यही चाह है। इस मौक़े पर एक ग़ज़ल आप सब के लिए। सादर,] 


 

हर  क़दम  हौसला  बढ़ाता है
सब्र किस दर्जा काम आता है

ख्वाब देखूँ तो किस तरह देखूँ
नींद  से  रोज़  वो  जगाता  है

जिस ने मेरा मकाँ जलाया था
आज वो  अश्क़ भी बहाता है

उस की रहमत पे  है नज़र वर्ना
साथ मुश्किल में कौन आता है

काटिए मत  हरा  शजर   ऐसे
धूप  में सब के  काम आता है

हादसे   ख़ुद  नज़र बचाते हैं
मौत से आँख जो मिलाता है

अपने बाज़ू पे रख यक़ीँ हिमकर
जीस्त  का  बोझ  जो  उठाता है

जीस्त : ज़िंदगी

© हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)



 

Tuesday, 10 October 2017

बात दिल की हमेशा सुना कीजिए


सामने   आप   मेरे   रहा   कीजिए
मुझको मुझसे न ऐसे जुदा कीजिए

है मुहब्बत अगर तो कहा कीजिए
बात दिल की हमेशा सुना कीजिए


क्या ख़ता है मेरी आप क्यूँ हैं ख़फ़ा
गर गिला हो कोई तो कहा कीजिए

कब बदल जाए नीयत किसी की यहाँ
हर किसी से न  हँस के मिला कीजिए

मैंने अहसास दिल का बयाँ कर दिया
यूँ  न  हैरत से मुझको  तका कीजिए
 



© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)
 

Saturday, 9 September 2017

छोड़ दे माजी के ग़म रोता है क्या





दर्द का रिश्ता भला  ढोता  है  क्या
छोड़ दे माजी के ग़म, रोता है क्या

ज़िक्र  क्यों नाकामियों  का कर रहा
जो हो गया वो हो गया रोता है क्या

आदमी  बोता  है जो  वह काटता
जान कर भी ज़ह्र तू बोता है क्या

दाग़ दामन के  कभी  मिटते  नहीं
हाए अब तू अश्क़ से धोता है किया

अहले दिल से पूछ ले क़ीमत कभी
इश्क़ दौलत है बड़ी, खोता है क्या

एक दिन सब  कुछ फ़ना हो जाएगा
फिर किसी की मौत पर रोता है क्या

कौन जाने कब ये किस्सा ख़त्म हो
तेरा किस्सा मुख़्तसर होता है क्या

रफ़्ता-रफ़्ता उम्र हिमकर ढल रही
बैठे- बैठे वक़्त तू खोता है क्या

 © 
हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)