बुलंदी पे कहाँ कोई
ठहरता है
फ़लक से रोज ये सूरज
उतरता है
गरूर उसके डुबो देंगे
उसे इक दिन
नशा शोहरत का चढ़ता
है, उतरता है
दबे कितने त्वारीखों
के सफ़हों में
भला किसको ज़माना याद
रखता है
यहां कितनों को देखा
ख़ाक में मिलते
कोई नायाब ही गिर कर सँभलता
है
न देखा हो अगर तो
देखलो आकर
पलों में रुख़ सियासत
का बदलता है
न है तुमको अभी अहसास
तूफ़ां का
शजर तो आँधियों में
ही उजड़ता है
भरोसा दोस्ती का अब
नहीं हमको
जरूरत जब पड़े लहज़ा
बदलता है
कि उसके लफ़्ज़ भी
नश्तर से चुभते हैं
ज़ुबां से जहर जब कोई
उगलता है
चला है ज़ोर किसका
वक़्त के आगे
कि मुठ्ठी से हरिक
लम्हा फिसलता है
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
