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Thursday, 4 February 2016

शेष है स्वपन


गुज़र रहा है
लम्हा-लम्हा
उड़ा जा रहा
हाथों से क्षण।

थमतीं नहीं  
चलती हुईं  
घड़ियाँ
हाए, कैसी ये
मजबूरियाँ
रीत रहा मन।

क्यूं बैठ रोता
सूख रहा
समय का सोता
छीन रही उमर 
शेष है स्वपन।


© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

Thursday, 1 October 2015

बुलंदी पे कहां कोई ठहरता है


बुलंदी पे कहाँ कोई ठहरता है
फ़लक से रोज ये सूरज उतरता है

गरूर उसके डुबो देंगे उसे इक दिन
नशा शोहरत का चढ़ता है, उतरता है

दबे कितने त्वारीखों के सफ़हों में
भला किसको ज़माना याद रखता है

यहां कितनों को देखा ख़ाक में मिलते
कोई नायाब ही गिर कर सँभलता है

न देखा हो अगर तो देखलो आकर
पलों में रुख़ सियासत का बदलता है

न है तुमको अभी अहसास तूफ़ां का
शजर तो आँधियों में ही उजड़ता है

भरोसा दोस्ती का अब नहीं हमको
जरूरत जब पड़े लहज़ा बदलता है

कि उसके लफ़्ज़ भी नश्तर से चुभते हैं
ज़ुबां से जहर जब कोई उगलता है

चला है ज़ोर किसका वक़्त के आगे
कि मुठ्ठी से हरिक लम्हा फिसलता है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)