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मन. स्वप्न. वर्ल्ड कैंसर डे पर.
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गुज़र रहा है
लम्हा-लम्हा
उड़ा जा रहा
हाथों से क्षण।
थमतीं नहीं
चलती हुईं
घड़ियाँ
हाए, कैसी ये
मजबूरियाँ
रीत रहा मन।
क्यूं बैठ रोता
सूख रहा
समय का सोता
छीन रही उमर
शेष है स्वपन।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)