Tuesday, 27 October 2015
Wednesday, 21 October 2015
विजय पर्व पर कीजिए, पापों का संहार
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विजयादशमी. दशहरा
Thursday, 1 October 2015
बुलंदी पे कहां कोई ठहरता है
बुलंदी पे कहाँ कोई
ठहरता है
फ़लक से रोज ये सूरज
उतरता है
गरूर उसके डुबो देंगे
उसे इक दिन
नशा शोहरत का चढ़ता
है, उतरता है
दबे कितने त्वारीखों
के सफ़हों में
भला किसको ज़माना याद
रखता है
यहां कितनों को देखा
ख़ाक में मिलते
कोई नायाब ही गिर कर सँभलता
है
न देखा हो अगर तो
देखलो आकर
पलों में रुख़ सियासत
का बदलता है
न है तुमको अभी अहसास
तूफ़ां का
शजर तो आँधियों में
ही उजड़ता है
भरोसा दोस्ती का अब
नहीं हमको
जरूरत जब पड़े लहज़ा
बदलता है
कि उसके लफ़्ज़ भी
नश्तर से चुभते हैं
ज़ुबां से जहर जब कोई
उगलता है
चला है ज़ोर किसका
वक़्त के आगे
कि मुठ्ठी से हरिक
लम्हा फिसलता है
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
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