Tuesday, 27 October 2015

नेह लुटाती चाँदनी


शीतल, उज्जवल रश्मियाँ, बरसे अमृत धार।
नेह लुटाती चाँदनी, कर सोलह श्रृंगार।।

शरद पूर्णिमा रात में, खिले कुमुदनी फूल।
रास रचाए मोहना, कालिंदी के कूल।।

सोलह कला मयंक की, आश्विन पूनो ख़ास।
उतरी धरा पर माँ श्री, आया कार्तिक मास।।

लक्ष्मी की आराधना, अमृतमय खीर पान।
पूर्ण हो मनोकामना, बढे मान-सम्मान।। 

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

Wednesday, 21 October 2015

विजय पर्व पर कीजिए, पापों का संहार


जगत जननी जगदम्बिका, सर्वशक्ति स्वरूप।
दयामयी दुःखनाशिनी, नव दुर्गा नौ रूप।। 
शक्ति पर्व नवरात्र में, शुभता का संचार।
भक्तिपूर्ण माहौल से, होते शुद्ध विचार ।। 
जयकारे से गूंजता, देवी का दरबार।
माता के हर रूप को, नमन करे संसार।।
माँ अम्बे के ध्यान से, मिट जाते सब कष्ट।
रोग शोक संकट सभी, हो जाते हैं नष्ट।।


काम, क्रोध, मद, मोह, छल, अन्याय, अहंकार।
रावण की सब वृत्तियाँ, मन के विषम विकार।।
विजय पर्व पर कीजिए, पापों का संहार।
रावण भीतर है छुपा, करिए उस पर वार।। 

[दुर्गा पूजा, विजयादशमी और दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ]


©हिमकर श्याम 


(चित्र गूगल से साभार)





Thursday, 1 October 2015

बुलंदी पे कहां कोई ठहरता है


बुलंदी पे कहाँ कोई ठहरता है
फ़लक से रोज ये सूरज उतरता है

गरूर उसके डुबो देंगे उसे इक दिन
नशा शोहरत का चढ़ता है, उतरता है

दबे कितने त्वारीखों के सफ़हों में
भला किसको ज़माना याद रखता है

यहां कितनों को देखा ख़ाक में मिलते
कोई नायाब ही गिर कर सँभलता है

न देखा हो अगर तो देखलो आकर
पलों में रुख़ सियासत का बदलता है

न है तुमको अभी अहसास तूफ़ां का
शजर तो आँधियों में ही उजड़ता है

भरोसा दोस्ती का अब नहीं हमको
जरूरत जब पड़े लहज़ा बदलता है

कि उसके लफ़्ज़ भी नश्तर से चुभते हैं
ज़ुबां से जहर जब कोई उगलता है

चला है ज़ोर किसका वक़्त के आगे
कि मुठ्ठी से हरिक लम्हा फिसलता है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)