Tuesday, 14 March 2017

तितलियाँ



चंचल मोहक तितलियाँ, रंग-बिरंगे पंख
करती थीं अठखेलियाँ, जो फूलों के संग

बगिया में रौनक नहीं, उपवन है बेरंग
कहाँ तितलियाँ गुम हुईं, लेकर सारा रंग
 
© हिमकर श्याम
  
(चित्र गूगल से साभार)
 


Tuesday, 14 February 2017

छुपी है मुहब्बत भी इनकार में



छुपी है मुहब्बत भी इनकार में
अलग ही मज़ा ऐसे इकरार में
बहुत हमने ढूँढा न पाया उसे
अभी वक़्त बाकी है दीदार में

लबों पर हँसी अब दिखाई न दे
फ़क़त अश्क़ हासिल तेरे प्यार में
हुआ दिल पे नज़रों का ऐसा असर
मैं खोया रहा कूचा ए यार में
यहीं पर मिले थे वो हमसे कभी
कई याद लिपटी है दीवार में
ग़मों को न इतना दबाया करो
खुलेगी कोई राह गुफ़्तार में
कोई ज़ख़्म सीने में 'हिमकर' दबा
जिसे तुमने ढाला है अशआर में



गुफ़्तार : बातचीत


© हिमकर श्याम
  
[पेंटिंग साभार प्रीति श्रीवास्तव जी ]