Sunday, 14 May 2017

माँ के क़दमों में है ज़न्नत दोस्तो




वह ख़ुदा की ख़ास नेमत दोस्तो
माँ के क़दमों में है ज़न्नत दोस्तो

लाख परदा तुम गिरा लो झूठ पर
छुप नहीं सकती हक़ीक़त दोस्तो

है तरक्क़ी मुल्क़ में हमने सुना
कम कहाँ होती मशक्क़त दोस्तो

ज़िन्दगी किसकी मुकम्मल है यहाँ
साथ सबके इक मुसीबत दोस्तो

इन परिंदों को भला क्या चाहिए 
आबो दाने की जरूरत दोस्तो

मुश्किलों में साथ देता कौन है
पर सभी देते नसीहत दोस्तो

रात भर करवट बदलते हम रहे
अब सही जाती न फ़ुर्क़त दोस्तो

इश्क़ की पाकीज़गी जाने कहाँ
प्यार में भी है कुदूरत दोस्तो

ग़म हमेशा साथ हिमकर के रहा
ज़िंदगानी में अज़ीयत दोस्तो


मुकम्मल : सम्पूर्ण, फ़ुर्क़त : जुदाई, कुदूरत : मैल, अज़ीयत : कष्ट 



© हिमकर श्याम


 

Tuesday, 14 March 2017

तितलियाँ



चंचल मोहक तितलियाँ, रंग-बिरंगे पंख
करती थीं अठखेलियाँ, जो फूलों के संग

बगिया में रौनक नहीं, उपवन है बेरंग
कहाँ तितलियाँ गुम हुईं, लेकर सारा रंग
 
© हिमकर श्याम
  
(चित्र गूगल से साभार)