Thursday, 24 September 2015

सौदा



गई रात ख्यालों में
देने लगा कोई दस्तक
पूछा- कौन ?
बोला-सौदागर
इतनी रात गए कैसे?
सौदा करने
कैसा सौदा?
ज़मीर का- बेचोगे?
बदले में क्या दोगे?
चमचमाते सोने के कुछ टुकड़े।


© हिमकर श्याम 

(एक पुरानी रचना)

चित्र गूगल से साभार

Thursday, 17 September 2015

विघ्न विनाशक आ गए




!श्री गणेशाय नमः!

गणपति, गणनायक हरें, सभी के दुःख क्लेश।
शिव-गौरी के लाड़ले, प्रथम पूज्य गणेश।।

ऋद्धि-सिद्धि सुख सम्पदा, करते जो प्रदान।
विघ्न विनाशक आ गए, करे जग कल्याण।।

मूषक वाहन साथ में, भाता मोदक भोग।
सिद्धि विनायक भुवनपति, वंदन करते लोग।।

[गणेश चतुर्थी और विश्वकर्मा पूजा की शुभकामनाएँ]

 © हिमकर श्याम

Monday, 14 September 2015

दूसरी आवाज़

सोमवार, 14 सितम्बर का  यह दिन  मेरे  लिए  बहुत  ख़ास  है। इसके  ख़ास  होने  की  तीन वजहें  हैं पहली, आज  हिंदी (मातृभाषा) दिवस है। दूसरी वजह, आज मेरी माँ का जन्मदिन है। तीसरी और ख़ास वजह यह कि आज से मैं एक नया ब्लॉग  शुरू करने जा रहा हूँ। मैंने ब्लॉग लिखने की शुरुआत 3 नवम्बर 2013 को Blogspot पर की थी, जिसे छोटे भाई रविकर ने बनाया था। ब्लॉग का नाम रखा गया शीराज़ा, जिसमे मैं अपनी काव्य रचनाएँ पोस्ट करता हूँ। आलेख के लिए बहुत दिनों से एक अन्य ब्लॉग शुरू करना चाहता था।  नये ब्लॉग के लिए wordpress का चयन किया। इस ब्लॉग को छोटे भाई रोहित कृष्ण ने बनाया है। पिताजी के सुझाव से नए ब्लॉग का नाम 'दूसरी आवाज़ ' रखा गया है।
जब मैंने 'शीराज़ा' की शुरुआत की थी तो सोचा नहीं था कि पाठकों,ब्लॉगर मित्रों और टिप्पणीकारों का इतना स्नेह और प्रोत्साहन मिलेगा। पाठकों के सहयोग के वगैर कोई भी व्यक्ति अधिक समय तक नहीं लिख सकता। अपने सुझाव और प्रोत्साहन नए ब्लॉग 'दूसरी आवाज़' को भी दें, ताकि मैं अपनी पूरी ऊर्जा, सामर्थ्य, निष्ठा और लगन के साथ लिखता रहूँ। हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ

हिमकर श्याम 

दूसरी आवाज़ 

https://doosariaawaz.wordpress.com/

Thursday, 10 September 2015

धूप मुठ्ठी में जो आई



हम जो गिर-गिर के सँभल जाते तो अच्छा होता
वहशत ए दिल से निकल पाते तो अच्छा होता

बदनसीबी ने कई रंग दिखाए अब तक
बिगड़ी तक़दीर बदल पाते तो अच्छा होता

ख़्वाब आंखों में पले और बढ़े घुट-घुट कर
दो घड़ी ये भी बहल जाते तो अच्छा होता

किस कदर हमने बनाया था तमाशा अपना
कू ए जानां से निकल जाते तो अच्छा होता

धूप मुठ्ठी में जो आई तो सजे थे अरमां
हम उजालों से न छल पाते तो अच्छा होता

लब हंसे जब भी हुआ रश्क मेरे अपनों को
ऐसी सुहबत से निकल जाते तो अच्छा होता

वक़्त के साथ न हिमकर ने बदलना सीखा
वक़्त के सांचे में ढल पाते तो अच्छा होता

© हिमकर श्याम 

(तस्वीर छोटे भाई रोहित कृष्ण की)


Friday, 4 September 2015

रूप सलोना श्याम का


[जन्माष्टमी पर कुछ दोहे]

रूप सलोना श्याम का, मनमोहन चितचोर।
कहतीं ब्रज की गोपियाँ, नटखट माखन चोर।।

माँ यशोदा निरख रही, झूमा गोकुल धाम। 
मीरा के मन में बसे, जपे सुर घनश्याम।। 

सुधबुध खोई राधिका, सुन मुरली की तान।
अर्जुन की आँखें खुली, पाकर गीता ज्ञान।।

झूठे माया मोह सब, सच्चा है हरिनाम।
राग,द्वेष को त्याग कर, कर्म करें निष्काम।।       

पाप निवारण के लिए, लिया मनुज अवतार।
लीलाधारी कृष्ण की, महिमा अपरम्पार।।

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)