ढाक-साल सब खिल गए, मन मोहे कचनार।
वन प्रांतर सुरभित हुए, वसुधा ज्यों गुलनार।।
गमक उठे हैं साल वन, झरते सरई फूल।
रंग-गंध आदिम लिए, मौसम है अनुकूल।।
मीन- केकड़ा का यहाँ, पुरखों जैसा मान।
दोनों के सहयोग से, पृथ्वी का निर्माण।।
निखरा-निखरा रूप है, बाँटे स्नेह अथाह।
धरती दुल्हन सूर्य की, रचने को है ब्याह।।
मटके का जल देख कर, वर्षा का अनुमान।
युगों पुरानी यह प्रथा, आदिम रीति विधान।।
उत्सव का माहौल है, शहर हो कि हो गाँव।
ढोल- नगाड़े बज रहे, थिरक रहे हैं पाँव।।
■ हिमकर श्याम


