Friday, 5 June 2015

नदी की व्यथा


(पर्यावरण दिवस पर एक पुरानी रचना)
(एक)
शहर की बेचैन भीड़ में
गुम हो गयी है वो नदी
जो सदियों से बहती थी
यहां के वन-प्रांतरों में
यहां के परिवेश में
सिखाती थी अनुशासन
बाँटा करती थी संस्कार।

नदी जो साक्षी रही है
हर्ष-विषाद, सुख-दुख,
संघर्षों और विकास की
समृद्धि और ऐश्वर्य की
खड़ी है आज अकेली
निस्तब्ध और उदास
बेबस ओर लाचार।

वरदान थी शहर की
वाशिंदों की खातिर
आंचल में लाती थी
शीपी, शंख और रेत
रंग-बिरंगी मछलियाँ 
बाँहों में भर के प्यार।

बेच रहे हैं नदी को
सैकड़ों गिरोहबंद
दलाल और ठेकेदार
बेच रहे हैं सपने
फैला रहे हैं भ्रमजाल
समृद्धि का कारोबार।

भूल गये हैं लोग
नदी से अपने रिश्ते
जिसके किनारों पर
मिलता था मोक्ष
बांटा करती थी जो नदी
छोटी-छोटी परेशानियाँ 
क्षणभंगुर लालसाओं की
बन गयी है शिकार।

जहां जिसने भी चाहा
नदी के सीने पर
बना लिया आशियाँ 
खटाल और तबेला
उड़ेलने लगे गंदगी
प्रदूषण व अतिक्रमण से
छीन ली गयी पवित्रता
मिलने लगा तिरस्कार।

जीवित है नदी इस आशा में
लौटेंगे वे लोग किनारों पे
भूल बैठे हैं जो नदी से रिश्ते
छोड़ गये है उसे अकेले
रूकेंगे वे हुक्मरान भी जो
गुजरते हैं उसके ऊपर से
लाल बत्तीवाली गाड़ियों में
देखेंगे उसकी दुर्दशा
लौटेगी फिर उसकी धार।


(दो)

चमकीली बस्तियों की
कोलाहल और भीड़ में
खो गयी है जो नदी
हो रही है उसकी तलाश
नदी जो बहती थी
यहां युगों-युगों से
कभी थी जीवन-रेखा
कोलाहल और भीड़ में
खो चुकी थी पहचान
खो चुकी थी अहमियत।

अनजानी लालसाओं
बेचैन सपनों के पीछे
भूल गये थे जो लोग
नदी से अपने रिश्ते
किनारों से अपना नाता
समझने लगे हैं वे
नदी की सार्थकता
जागने लगी है
उनकी सोई चेतना
ढ़ूंढ रहे हैं वे नदी को।

लौटेगी फिर नदी की धार
लौटेगी खोई पवित्रता
होगा अब पुनरू़द्धार
मापी जाएगी सीमा
हटेगा अतिक्रमण
होने लगी है बहस
बनने लगा है कारवाँ।



© हिमकर श्याम
(तस्वीरें सानंद मनु की)


50 comments:

  1. हिमकर जी, नदी की व्यथा को बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-06-2015) को "विश्व पर्यावरण दिवस" (चर्चा अंक-1998) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    विश्व पर्यावरण दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. चर्चा मंच पर इस पोस्ट को शामिल करने के लिये आभार.

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  3. बहुत ही सुन्दर और सत्य

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज विश्व पर्यावरण दिवस है - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. ब्लॉग बुलेटिन में इस पोस्ट को शामिल करने के लिये आभार.

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  5. Replies
    1. स्वागत है आपका...ब्लॉग से जुड़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!!

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  6. nadi ke dard ko bhi abhivyakti mil gai hai ...sundar

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  7. नदी का दर्द बहुत अच्छे तरीके से व्यक्त किया आपने

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  8. सुन्दर कविताएँ

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  9. sunder ... 2012 mein likhi kavita ...patrika mein chhpne ki bdhai .....

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    1. लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई, हार्दिक आभार !!

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  10. नदी निरंतर बहती है लोकहित में और हम इंसान जरा भी नहीं सोचते। ।
    सटीक चित्रण ....

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  11. नदी की व्यथा को बहुत भावमयी शब्द दिए हैं...एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति...

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  12. नदी की व्यथा का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है आपने, पढ़ते हुए लग रहा था हूबहूब मेरे गांव की नदी हो जैसे, अफ़सोस सालों पहले इसका अस्तित्व भी कुछ इसी तरह समाप्त हो गया था ! कविता के अंत में जो सोई हुई चेतना के फिर से जागने की बात कही है मुझे अच्छा लगा ताकि खोई हुई नदी का फिर से अवतरण हो, बहुत बहुत बधाई इस रचना के प्रकाशन पर !

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    1. सराहना तथा प्रोत्साहन के लिए हृदय से धन्यवाद एवं आभार !
      ~सादर

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  13. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  14. दोनों रचनाएँ सोचने को मजबूर कर रही हैं। कहाँ से कहाँ आ गए हम।

    यहाँ भी पधारें
    http://chlachitra.blogspot.in/

    http://cricketluverr.blogspot.com

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  15. जीवनदायी नदी की व्यथा कथा कहती रचनाएँ । बहुत उम्दा

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    1. आपकी प्रतिक्रिया पाकर ख़ुशी हुई, धन्यवाद...ब्लॉग पर आती रहें

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  16. दोनों रचनाएं बहुत प्रभावी और नदी की अहमियत और उसकी महत्ता को स्पष्ट कर रही हैं ...
    नदियाँ किसी समय में आबादी की पहचान हुआ करती थीं ... लाइफ लाइन हुआ करती हीन पर आज इनसान उनकी ख़त्म करने पे तुला है ...

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    1. सराहना तथा प्रोत्साहन के लिए हृदय से धन्यवाद एवं आभार !

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  17. बहुत प्रभावशाली रचनाएँ...सचमुच हमने अपनी नदियों की पवित्रता को मटियामेट कर दिया है, बढती हुई जनसंख्या और मानव का बढ़ता हुआ लोभ..या कहें कि अंधाधुंध विकास..सभी ने मिलकर ऐसा जाल फैलाया है कि खो गयी हैं कोमल भावनाएं...

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  18. दुःख इसी बात का होता कि लोग ये नहीं सोचते कि सरस्वती एक बार चली गयी तो लौट कर नहीं आई . हृदय को छूती है आपकी रचना.

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    1. हृदय से धन्यवाद एवं आभार !

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  19. प्रकृति मौन रह कर सब सह लेती है इसलिए इंसान उसकी कीमत नहीं समझता. दोनो ही बहुत अच्छी रचनाएँ हैं

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  20. संवेदनशील ह्रदय की बहुत सुन्दर ,सार्थक ,विचारणीय प्रस्तुति ....सादर नमन वंदन !!

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    1. सराहना तथा प्रोत्साहन के लिए हृदय से धन्यवाद एवं आभार !
      ~सादर

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  21. nadi ki wyatha ko sundar shabd aapne diya hai...

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  22. नदी की व्यथा का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है आपने,

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  23. बेच रहे हैं नदी को
    सैकड़ों गिरोहबंद
    दलाल और ठेकेदार
    बेच रहे हैं सपने
    फैला रहे हैं भ्रमजाल
    समृद्धि का कारोबार।

    भूल गये हैं लोग
    नदी से अपने रिश्ते
    जिसके किनारों पर
    मिलता था मोक्ष
    बांटा करती थी जो नदी
    छोटी-छोटी परेशानियाँ
    क्षणभंगुर लालसाओं की
    बन गयी है शिकार।

    बहुत सार्थक पोस्ट !

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