Tuesday, 15 July 2014

कहाँ छुपे हो मेघ तुम


(चित्र गूगल से साभार) 


सावन में धरती लगे, तपता रेगिस्तान  
सूना अम्बर देख के, हुए लोग हलकान  

कहाँ छुपे  हो मेघ तुम, बरसाओं अब नीर  
पथराये हैं नैन ये,  बचा न मन का धीर

बिन पानी व्याकुल हुए, जीव-जंतु इंसान
अपनी किस्मत कोसता, रोता बैठ किसान  

सूखे-दरके खेत हैंकैसे उपजे धान 
मॉनसून की मार से, खेती को नुकसान

खुशियों के लाले पड़े, बढ़े रोज संताप  
मौसम भी विपरीत है, कैसा यह अभिशाप

सूखे पोखर, ताल सब, रूठी है बरसात  
सूखे का संकट हरो, विनती सुन लो नाथ       

© हिमकर श्याम 

 

23 comments:

  1. समसामयिक भाव..... अब तो बरसें मेघा

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  2. सूखे-दरके खेत हैं, कैसे उपजे धान
    मॉनसून की मार से, खेती को नुकसान ...
    सभी दोहे लाजवाब ... मानसून की कमी खल रही है धरती को .. कलम को ....
    अब तो टप टप बरसो ...

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    1. सही कहा आपने...शुक्रिया...

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  3. इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 20/07/2014 को "नव प्रभात" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1680 पर.

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    1. उत्साहवर्धन हेतु आपका आभारी हूँ...

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  4. बहुत सुन्दर और प्रभावी दोहे...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ...सादर !

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  5. अच्छी रचना.

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  6. सुन्दर रचना

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  7. सुन्दर प्रस्तुति।

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    1. सादर अभिवादन...प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार!

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  9. खुशियों के लाले पड़े, बढ़े रोज संताप
    मौसम भी विपरीत है, कैसा यह अभिशाप
    ............. सुन्दर और प्रभावी दोहे...

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