Friday, 20 March 2015

चहक-चहक मन मोहती

(विश्व गौरैया दिवस पर)

घर आँगन सूना लगे, ख़ाली रोशनदान
रोज़ सवेरे झुण्ड में, आते थे मेहमान।।

प्यारी चिड़ियाँ गुम हुई, लेकर मीठे गान।
उजड़ गए सब घोंसले, संकट में है जान।।

चहक-चहक मन मोहती, चंचल शोख़ मिज़ाज।
बस यादों में शेष है, चूं-चूं की आवाज़।।

बाग़-बगीचों की जगह, कंक्रीट के मकान।
गोरैया रूठी हुई,  अपराधी इनसान।।

कहाँ गयी वह सहचरी, बच्चों की मुस्कान।
दाना-पानी दे उसे, करें नीड़ निर्माण।।

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)



28 comments:

  1. सुन्दर रचना !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है अगर पसंद आये तो कृपया कर अपने सुझाव दे

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  2. अंतर्राष्ट्रीय गोरैया दिवस पर बहुत सुंदर रचना.अति विकास की भेंट चढ़ गई है,गोरैया जैसी छोटी पक्षियों का विलुप्त होना.

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  3. भारतीय नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच "करूँ तेरा आह्वान " (चर्चा - 1925) पर भी होगी!

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    1. बहुत -बहुत धन्यवाद, मयंक जी . चर्चा में मेरी प्रविष्टि को शामिल किया,आभारी हूँ .

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  4. कहाँ गयी वह सहचरी..बच्चों की मुस्कान ..सच में जिस तरह शहरों से गौरैया गायब हो गयी हैं वह चिंता का विषय है.बहुत ही अच्छी कविता लिखी है आपने ..............साथ दिया यह चित्र भी जीवंत लग रहा है .
    यहाँ एमिरात में जहाँ मैं रहती हूँ वहाँ आसपास पेड़ हैं घर के सामने ही लगे हरे भरे पेड़ पर खूब चिड़ियाँ आती हैं ..देखकर बहुत सुकून मिलता है.

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    1. घर को अपनी चीं..चीं से चहकाने वाली गौरैया हाल तक यहाँ दिखाई देती थी, अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती...आभार

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  5. यथार्थ बयान किया है आपने

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  6. कहाँ गयी वह सहचरी, बच्चों की मुस्कान।
    दाना-पानी दे उसे, करें नीड़ निर्माण।।
    आज सच में जरूरत है पुनः उस मुकान को वापस लाने की ... जिस तेज़ी से शहरों से गौरैया की संख्या घाट रही है वो चिंता जनक है ... अल्पना जी ने सच कहा है ... अमीरात में जहां वातावरण इन पंछियों के पूरक बन रहा है अपने देश में पता नहीं क्या हो रहा है ...

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    1. हाँ अब स्थिति बदल गई है। गौरैया की संख्या काफी कम हो गयी है...कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।...आभार

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  7. बाग़-बगीचों की जगह, कंक्रीट के मकान।
    गोरैया रूठी हुई, अपराधी इनसान।।
    सच कहां आपने यह मानव का की अपराध हैं..........
    http://savanxxx.blogspot.in

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  8. सार्थक रचना

    सच में आँगन की चूँ चूँ खो गयी है ।

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  9. सुन्दर सार्थक प्रस्तुति ...

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  10. घर आँगन सूना लगे, ख़ाली रोशनदान।
    रोज़ सवेरे झुण्ड में, आते थे मेहमान।।

    वाह गज़ब .....बहुत सुन्दर

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  11. मुझे ठीक से जानकारी नहीं है कि मोबाइल टावर के विकिरण जिम्मेदार हैं इसके लिए. लेकिन छत के घरों से निश्चय ने इनके सहज आवास उजाड़ दिए हैं. आपकी रचना इस व्यथा को सही आवाज़ दे रही है.

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    1. आपने सही कहा , मोबाइल टावर से निकलने वाली किरणें भी गौरैया की जान की दुश्मन बनी हुई हैं. शहरों में वातावरण अब गौरैया के लिए अनुकूल नहीं रहा. गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं बची है. हर शहर कंक्रीट के आशियानों में बदल चुका है...आभार

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  12. अति सुन्दर, सार्थक रचना !

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  13. बहुत सुन्दर कविता !

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    1. सादर आभार, आदरणीया

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