Monday, 9 December 2013
Sunday, 1 December 2013
झूठ की नुमाइश है, झूठ का दिखावा है
आदमी की बस्ती में भीड़
का छलावा है
झूठ की नुमाइश है, झूठ का दिखावा है
ज़िन्दगी कहाँ यूँ ख़ैरात से
सँवरती है
आज भी ज़रूरत में बस वही
निवाला है
ख़ु़श्क हो गईं नदियां, सिमटने लगे सागर
क्या कहें उसे गंगा, बन गयी जो नाला
है
जिस्म में छुपी रूहें, रूह तक हताशा हैं
हर तरफ उदासी है, बेबसी का हाला है
फिर शहर ने ओढी है चेहरे
पे बेचैनी
ज़श्न है यहां कोई या
ग़मों की माला है
थम गयी उमंगें बाजार की
अचानक ही
देखते ही जरदारी का पिटा
दिवाला है
डर हमें नहीं लगता मौसमी
बलाओं से
देश को हमारे इन हादसों
ने पाला है
हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से
साभार)
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