Friday, 7 March 2014

चलती रहेंगी बहसें

बार-बार, हर बार
मौसम दर मौसम
साल दर साल
उठता रहा है
नारी मुक्ति का प्रसंग
रैलियों में, धरनों पर
बैठकों में, मंचों पर
अख़बारों में, टी.वी पर
होती रही हैं बहसें

बार-बार, हर बार
महिला दिवस के
आसपास निकल आते हैं
सड़कों पर
महिला हक़ों के
सैकड़ों झंडाबरदार
हर तरफ मचता है
नारी मुक्ति का शोर
धूप चश्मे, रंगीन छतरी में
उतरती हैं सड़कों पर
संभ्रांत-प्रगतिशील औरतें
लगाती हैं नारे
करती हैं प्रदर्शन
अपनी ताकत का

बार-बार, हर बार
नारी मुक्ति की आड़ में
चलाते हैं सब दुकानें
वातानुकूलित कमरों में
होतीं हैं नारी मुक्ति पर
ढ़ेरों बैठकें, परिचर्चाएँ
स्त्री हक़ों की खातिर
न्यूज चैनलों पर
उठती हैं आवाज़े
नारीवादी सपनों में
भरी जाती हैं उड़ानें

बार-बार, हर बार
मारी जाती हैं
कोख में कन्याएँ
थमती नहीं है
दहेज हत्याएँ
दरिंदगी का शिकार
बनती हैं निर्भयाएँ
होता है चीरहरण
आज भी द्रौपदी का
देनी पड़ती है सीता को
अग्नि परीक्षाएँ
ज़िस्म की मंडियों में
सिसकती हैं लड़कियाँ
लांघता है बाज़ार
शालीनता की सीमाएँ
उघाड़ता है परत दर परत 
देह की मर्यादाएँ
बार-बार, हर बार
किया जाता रहा है
स्त्री हक़ों को नज़रंदाज़
अनुत्तरित रह जाते हैं
समानता के सवाल
अनसुनी रह जाती है
देह के भीतर दबी
धड़कनों की आवाज़
पलती है जिसमे
मुक्ति की कामनाएँ
बेड़ियों को तोड़कर पाना
चाहती है जो मुक्ताकाश
बनाना चाहती है
देह से इतर
खुद की पहचान

बार-बार, हर बार
सड़क से संसद तक
खायी जाती हैं क़समें
लिए जाते हैं संकल्प
आधी आबादी को
मिलेगा पूरा हक़
पर मिलता है केवल
फ़रेब और तिरस्कार
बारम्बार
नहीं मिला हैं
आजतक स्त्री को
अपनी शर्तों पर
जीने का अधिकार

बार, बार, हर बार
आड़े आ जाता है
पुरुषों का अहंकार
सताने लगता है डर
खत्म न हो जाए
कहीं एकाधिकार
किंतु, परंतु में
सिमट जाती हैं
सारी बहसें
बदलती नहीं हाशिए की
महिलाओं की सूरतें
सदियाँ गुजरी
नयी बदली स्थिति
बदली नहीं पुरुषवादी
मानसिकताएँ
चलती रही हैं बहसें
और यूँही
चलती रहेंगी बहसें
बार-बार, हर बार।

© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)


26 comments:

  1. कन्या भ्रूण हत्या में संकीर्णता है, जबकि भ्रूण ह्त्या में व्यापकता है.....

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    1. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार!

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  2. सिर्फ बहस नहीं बल्कि सार्थक प्रयास की आवश्यकता है.
    बहुत सुंदर रचना.

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    1. सही कहा...बहुत बहुत आभार ....

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  3. अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस के अवसर पर ...महिलाओं के संघर्ष और वातावरण के उदासीनता को प्रदर्शित करती उत्कृष्ट रचना..........बहुत खूब श्रीमान.......

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  4. आप ने एक भावपूर्ण कविता लिखी है यह यहाँ कह देना पर्याप्त नहीं होगा ..यह रचना एक पुरुष की कलम से निकली हुई उसकी स्त्री के प्रति संवेदनाओं को बता रही है ,यह अपने आप में बड़ी बात है .आप को साधुवाद !
    काश समाज का हर अहंकारी पुरुष स्त्री के प्रति संवेदनशील रहे.
    सच में सदियों बाद भी एक स्त्री की छवि में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है ..वह उपभोग की वस्तु से ज़रा ऊपर ही उठी है .उसे अभी अपनी जगह और मजबूत करनी है और अपना महत्व भी बताना है.

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    1. अल्पना जी, खुले दिल से खूबसूरत विचार प्रकट करने लिए धन्यवाद…आपकी मूल्यवान प्रतिक्रिया से रचनाधर्मिता को नयी स्फूर्ति और ताजगी मिलती है... ब्लॉग से जुड़ने के लिए हार्दिक आभार…

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  5. वास्तविक सत्य से पहचान करा रही है ये रचना ...

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    1. संजय जी, बहुत बहुत आभार ...!

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  6. महिलाओ कि पीड़ा उसपर हो रहे अत्याचार को बड़ी सत्यता के साथ उजागर किया है..मन को छू लेनेवाली संवेदनशील रचना...

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    1. हृदय से आभार आपका...

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  7. बहुत ही भावपूर्ण और गहन विचारणीय कविता.... बेहतरीन प्रस्तुति...

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    1. रंजना वर्मा जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर प्रसन्नता हुई… ब्लॉग से जुड़ने के लिए हार्दिक आभार… सुझावों और प्रतिक्रियाओं से अवगत कराती रहें..

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  8. बहुत प्रभावी ... गहरा आक्रोश ... सामाजिक चेतना को झकझोरती ... कठोर सत्य को उजागर करती बहुत ही संवेदनशील रचना है ... सार्थक सन्देश और प्रहार करती है ...

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    1. उत्साहवर्धन हेतु आपका आभार!

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  9. कटु सत्य को दर्शाती बहुत प्रभावी और उत्कृष्ट प्रस्तुति....

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  10. सुन्दर और प्रभावी रचना ....बहुत बहुत बधाई...

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    1. ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

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  11. बदलती नहीं हाशिए की
    महिलाओं की सूरतें
    jab tak mahilaon kee mansikta nahi badalti surat badalni mushkil hai .very nice post .

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार… ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद…

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  12. you'r view is very right .celebrating woman's day isn't the way to make them empower .change in our man dominated society's mentality is the key to make woman empowered .

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    1. Thanks for visiting and for the kind encouragement.

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  13. बहुत सुन्दर प्रहार व्यवस्था और तथाकथित आज के इस नारी उन्मूलन कार्यक्रम पर। ऐसी सोच और इसे बढ़ावा देना बहुत ही ज्यादा ज़रूरी आज के हालात में। एक नई दिशा के साथ साथ दशा को वर्णित करती आपकी इस सुन्दर कृति हेतु
    हार्दिक बधाई

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार…स्वागत है आपका ...

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