Saturday, 13 June 2015

ढूंढते फिर रहे सब ख़ुशी का पता


बाँधते हैं उमीदें, रखें हौसला
हमने सीखी परिंदों से ऐसी अदा

साथ लेकर इरादे सफ़र में चलो
राह रोके खड़ीं है मुखालिफ़ हवा

जिस तरफ देखिए हैं उधर ग़मज़दा
ढूंढते फिर रहे सब ख़ुशी का पता

यह तो अच्छा हुआ जो भुलाया उन्हें
उनको फुर्सत कहाँ जो रखें वास्ता

हम न समझे कभी ये सियासी जुबाँ
तर्जुमा अलहदा और बातें जुदा

मिट गयी वो बगावत की तहरीर सब
बिक गए चंद सिक्कों में जो रहनुमा

सूझता ही नहीं अब कोई रास्ता
है नज़र में मेरे बस ख़ला ही ख़ला

काम आती नहीं है दवा या दुआ
संगदिल ज़िंदगी पर अभी आसरा

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)


28 comments:

  1. बहुत बहुत खूबसूरत रचना

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  2. सुन्दर रचना

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  3. खुशियों मत ढूंढ़ों यहां वहां क्‍योंकि खुशियां तो यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं हैं.....।

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  4. बहुत सुंदर रचना | होसला रखना हम परिंदो से ही सीख सकते हैं |

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  5. कमाल का लिखते हैं आप. नीचे की लाइन तो लाजवाब है आभार
    हम न समझे कभी ये सियासी जुबाँ
    तर्जुमा अलहदा और बातें जुदा

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  6. जिस तरफ देखिए हैं उधर ग़मज़दा
    ढूंढते फिर रहे सब ख़ुशी का पता
    क्या बात है बहुत सुन्दर, सभी एक से एक, सटीक रचना !

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  7. हम न समझे कभी ये सियासी जुबाँ
    तर्जुमा अलहदा और बातें जुदा
    ...वाह...सभी अशआर बहुत सटीक और उम्दा..

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  8. बहुत सुन्दर रचना...

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  9. मिट गयी वो बगावत की तहरीर सब
    बिक गए चंद सिक्कों में जो रहनुमा ..
    हकीकत बयान करते शेर हैं सभी ... आज के माहोल को आइना दिखाते हुए ... बहुत लाजवाब ...

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  10. बहुत सुन्दर

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  11. जिस तरफ देखिए हैं उधर ग़मज़दा
    ढूंढते फिर रहे सब ख़ुशी का पता

    यह तो अच्छा हुआ जो भुलाया उन्हें
    उनको फुर्सत कहाँ जो रखें वास्ता

    हम न समझे कभी ये सियासी जुबाँ
    तर्जुमा अलहदा और बातें जुदा

    शानदार ग़ज़ल लिखी है आपने हिमकर जी

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  12. Laajwaab ghazal likhi hai aapne. bahut achha laga.

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