Sunday, 24 April 2016

मुकम्मल बादशाई चाहता हूँ


मिटाना हर बुराई चाहता  हूँ 
ज़माने की भलाई चाहता हूँ

तेरे दर तक रसाई चाहता हूँ
मैं  तुझसे आशनाई चाहता हूँ

लकीरों से नहीं हारा अभी मैं 
मुक़द्दर से लड़ाई  चाहता  हूँ

दिलों के दरमियाँ बढ़ती कुदूरत
मैं थोड़ी अब  सफाई चाहता हूँ

हुआ जाता हूँ मैं मुश्किल पसंदी
नहीं  अब  रहनुमाई  चाहता  हूँ

पलटकर  वार  करना  है  जरूरी
मैं अब  जोर आज़माई चाहता हूँ

तेरी खामोशियाँ खलने  लगी है
कहूँ क्या लब कुशाई चाहता हूँ

खुदा से और क्या माँगू भला मैं 
ग़मों  से कुछ  रिहाई चाहता हूँ

गदाई अब नहीं मंज़ूर हिमकर
मुकम्मल  बादशाई चाहता हूँ

© हिमकर श्याम

14 comments:

  1. लकीरों से नहीं हारा अभी मैं
    मुक़द्दर से लड़ाई चाहता हूँ
    हर शेर का अंदाजे बयाँ अपनी बात को प्रखरता से रखता हुआ है ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-04-2016) को "मुक़द्दर से लड़ाई चाहता हूँ" (चर्चा अंक-2324) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. खुदासे और क्या मांगूं .....य़े लाइन मुझे बहुत सुंदर लगी । आप लिखते ही बहुत अच्छा है ।

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  4. सुन्दर रचना

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  5. मुकम्मल बादशाही चाहता हूँ आपकी बहुत ही रोचक रचना है यह, आपकी इस रचना के लिए आपको बधाई .....ऐसी रचना अब आप शब्दनगरी पर भी प्रकाशित कर सकतें है व अन्य लेखकों कि रचनाओ का आनंद भी ले सकतें हैं.......

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    1. सूचना के लिए धन्यवाद। यह जानकर अति प्रसन्नता हुई।

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