Sunday, 5 June 2016

यहाँ मौसम बदलते जा रहे हैं


हरे जंगल जो कटते जा रहे हैं
यहाँ मौसम बदलते जा रहे हैं

किधर जाएँ यहाँ से अब परिंदे
नशेमन सब उजड़ते जा रहे हैं

नयेपन की हवा ऐसी चली है
उसी रंगत में ढ़लते जा रहे हैं

नयी तहज़ीब में ढलता ज़माना
रिवायत को बदलते जा रहे हैं

सिखाते हैं सलीका हमको दीये
हवाओं में जो जलते जा रहे हैं

हुए हैं लोग पत्थर के यहाँ पर
किसे किस्सा युँ कहते जा रहे हैं

पतंगों की तरह हिमकर तसव्वुर
फ़लक पर ख़ूब उड़ते जा रहे हैं

© हिमकर श्याम

[तस्वीर फोटोग्राफिक क्लब रूपसी के अध्यक्ष श्रद्धेय डॉ सुशील कुमार अंकन जी की]

13 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "विश्व पर्यावरण दिवस - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 07/06/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  3. किधर जाएँ यहाँ से अब परिंदे
    नशेमन सब उजड़ते जा रहे हैं ...
    आपकी चिंता जाएज है ... जित तेज़ी से पेड़ कट रहे हैं ... पर्यावरण का नुक्सान हो रहा है ... एक दिन इंसान भी यही सोचेगा अब कहाँ जाऊं ...

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  4. बहुत खूब आदरणीय

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  5. प्रभावपूर्ण रचना...

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  6. वाह ! वाह ! बेहतरीन प्रस्तुति।

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  7. वाह ! , मंगलकामनाएं आपको.....

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  8. बहुत ही सुंदर और प्रभावी रचना की प्रस्‍तुति। आज बहुत दिनों के बाद ऐसा लिंक दिखाई पड़ा जिसके जरिए शीराजा पर आना हुआ। पर आते ही तबियत खुश हो गई। साहित्‍यक रचनाओं से दिमाग को बहुत सु‍कून मिलता है। अच्‍छी रचना के लिए आपका बहुत बहुत आभार।

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  9. बहुत सुन्दर

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  10. प्रभावपूर्ण रचना..

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  11. बहुत बढ़िया ।

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