Thursday, 1 October 2015

बुलंदी पे कहां कोई ठहरता है


बुलंदी पे कहाँ कोई ठहरता है
फ़लक से रोज ये सूरज उतरता है

गरूर उसके डुबो देंगे उसे इक दिन
नशा शोहरत का चढ़ता है, उतरता है

दबे कितने त्वारीखों के सफ़हों में
भला किसको ज़माना याद रखता है

यहां कितनों को देखा ख़ाक में मिलते
कोई नायाब ही गिर कर सँभलता है

न देखा हो अगर तो देखलो आकर
पलों में रुख़ सियासत का बदलता है

न है तुमको अभी अहसास तूफ़ां का
शजर तो आँधियों में ही उजड़ता है

भरोसा दोस्ती का अब नहीं हमको
जरूरत जब पड़े लहज़ा बदलता है

कि उसके लफ़्ज़ भी नश्तर से चुभते हैं
ज़ुबां से जहर जब कोई उगलता है

चला है ज़ोर किसका वक़्त के आगे
कि मुठ्ठी से हरिक लम्हा फिसलता है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)




13 comments:

  1. उम्दा सोच
    बेजोड़ रचना

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  2. चला है ज़ोर किसका वक़्त के आगे
    कि मुठ्ठी से हरिक लम्हा फिसलता है
    बहुत सुंदर गजल.
    नई पोस्ट : तलाश आम आदमी की

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-10-2015) को "तलाश आम आदमी की" (चर्चा अंक-2117) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  5. उत्कृष्ट प्रस्तुति

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  6. बहुत ही बेहेतरीन,प्रस्तुति ।

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  7. sarthak prastuti aapki hai...wah.

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  8. बुलंदी पर कहां कोई ठहरता है। बेहद शानदार रचना की प्रस्‍तुति।

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  9. हौसला अफजाई के लिए आप सब का तहे दिल से शुक्रिया.

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  10. गरूर उसके डुबो देंगे उसे इक दिन

    नशा शोहरत का चढ़ता है, उतरता है

    बहुत ही बेहेतरीन ।

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