Tuesday, 21 October 2014

माटी का दीपक बने, दीप पर्व की शान


चाक घुमा कर हाथ से, गढ़े रूप आकार।
समय चक्र ऐसा घुमा, हुआ बहुत लाचार।।
चीनी झालर से हुआ, चौपट कारोबार।
मिट्टी के दीये लिए, बैठा रहा कुम्हार।।
माटी को मत भूल तू, माटी के इंसान।
माटी का दीपक बने, दीप पर्व की शान।।

सज धज कर तैयार है, धनतेरस बाजार।
महँगाई को भूल कर, उमड़े खरीददार।।
सुख, समृद्धि, सेहत मिले, बढ़े खूब व्यापार।
घर, आँगन रौशन रहे, दूर रहे अँधियार।।
कोई मालामाल है, कोई है कंगाल।
दरिद्रता का नाश हो, मिटे भेद विकराल।।

चकाचौंध में खो गयी, घनी अमावस रात।
दीप तले छुप कर करे, अँधियारा आघात।।
दीपों का त्यौहार यह, लाए शुभ सन्देश।
कटे तिमिर का जाल अब, जगमग हो परिवेश।। 
ज्योति पर्व के दिन मिले, कुछ ऐसा वरदान।
ख़ुशियाँ बरसे हर तरफ़, सबका हो कल्याण।।

© हिमकर श्याम 


(चित्र गूगल से साभार)
















Saturday, 11 October 2014

कोई जादू लगे है ख़यालात भी

खूब होती शरारत मेरे साथ भी
सब्र को अब मिले कोई सौगात भी

रंजिशे और नफरत भुला कर सभी
हो कभी दिल से दिल की मुलाक़ात भी

है बला की कशिश और लज़्ज़त जुदा
कोई जादू लगे है ख़यालात भी

फ़ासले अब मिटें, बंदिशें सब हटें
प्यार की छांव में बीते दिन-रात भी

है लबों पे दुआ गर सुनो तुम सदा
हो अयाँ आंखों से दिल के जज़्बात भी

चाहतों से महकता रहे सहने दिल
हम पे रहमत करे अब ये बरसात भी

दूर रख इन ग़मों को चलो कुछ हँसे
वक़्त के साथ बदलेंगे हालात भी

अयाँ: जाहिर, सहन: आँगन

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)

Saturday, 13 September 2014

हिंदी अपनी शान हो


आज़ादी बेशक़ मिली, मन से रहे गुलाम।
राष्ट्रभाषा पिछड़ गयी, मिला न उचित मुक़ाम।।

सरकारें चलती रहीं, मैकाले की चाल।
हिंदी अपने देश में, उपेक्षित बदहाल।।

शिक्षा, शासन हर जगह, अंग्रेजी राज।
निज भाषा को छोड़कर, परभाषा पर नाज।।

मीरा, कबीर जायसी, तुलसी, सुर, रसखान। 
भक्तिकाल ने बढ़ाया, हिंदी का सम्मान।। 

देश प्रेमियों ने लिखे, थे विप्लव के गान।
इष्ट क्रांति की चेतना, हिंदी का वरदान।।

हिंदी सबको जोड़ती, करती है सत्कार।
विपुल शब्द भण्डार है, वैज्ञानिक आधार।।

स्वर व्यंजन के मेल का, नहीं है कोई जोड़। 
देवनागरी को कहें, ध्वनि शास्त्री बेजोड़।। 

बिन हिंदी चलता नहीं, भारत का बाज़ार।  
टी .वी., फिल्मों को मिला, हिंदी से विस्तार।। 

भाषा सबको बाँधती, भाषा है अनमोल।
हिंदी उर्दू मिल गले, देती हैं रस घोल।।

सब भाषा को मान दें, रखें सभी का ज्ञान। 
हिंदी अपनी शान हो, हिंदी हो अभिमान।। 

हिंदीजन मिल कर करें, हिंदी का उत्थान।
हिंदी हिंदुस्तान की, सदियों से पहचान।।
© हिमकर श्याम  

(चित्र गूगल से साभार)

[आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !!]