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Thursday, 23 October 2014

निष्ठुर तम हम दूर भगाएँ

मानव-मानव का भेद मिटाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ

आँसू की यह लड़ियाँ टूटे
खुशियों की फुलझड़ियाँ छूटे 
शोषण, पीड़ा, शोक भुलाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ

कितने दीप जल नहीं पाते
कितने दीप बुझ बुझ जाते
दीपक राग मिलकर गाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ

बाहर बाहर उजियारा है 
भीतर गहरा अँधियारा है 
अंतर्मन में ज्योति जगाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ

मंगलघट कण कण में छलके
कोई उर ना सुख को तरसे 
हर धड़कन की प्यास बुझाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ

आलोकित हो सबका जीवन
बरसे वैभव आँगन आँगन 
निष्ठुर तम हम दूर भगाएँ 
दिल से दिल के दीप जलाएँ

रोशन धरती, रोशन नभ हो
शुभ ही शुभ हो, अब ना अशुभ हो
कुछ ऐसी हो दीपशिखाएँ
      दिल से दिल के दीप जलाएँ


(चित्र गूगल से साभार)

[शुभ्र ज्योत्सना का यह पावन पर्व-आपके और आपके परिजनों के लिये सुख, समृद्धि, शांति, आरोग्य एवं धन-वैभव दायक हो इसी कामना के साथ दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!]       

[हिंदी तिथि के अनुसार आज इस ब्लॉग के एक वर्ष पूरे हो गए हैं. गत वर्ष दीपावली के दिन  ब्लॉग पर लेखन आरम्भ किया था. समस्त ब्लॉगर मित्रों, पाठकों, शुभचिन्तकों, प्रशंसकों, आलोचकों का हार्दिक धन्यवाद... अपना स्नेह ऐसे ही बनाये रखें…]

© हिमकर श्याम


Sunday, 3 November 2013

तम की विदाई


धरा रोशनी में हो जैसे नहाई
दिवाली की रौनक हरेक ओर छाई

उमंगों की किरणें झलकने लगी हैं
नयी ज्योति आशा की जलने लगी हैं
रंगोली से हमने ये चौखट सजाई  

पिरोई है हमने उम्मीदों की लड़ियाँ
ग़मों से ही छनकर निकलती हैं खुशियाँ
हमें मिलके करनी है तम की विदाई

है महलों में जगमग, अँधेरी है बस्ती
कहीं मौज-मस्ती, कहीं जान सस्ती
अमीरी गरीबी की गहरी है खाई


न बाकी बचे अब कहीं भी अँधेरा
न उजड़े कहीं भी किसी का बसेरा
कहीं कोई आंसू न दे अब दिखाई

नहीं मिट सकी है जिनकी उदासी
चलो उनमें बांटे हंसी हम जरा सी
मिले अब अमावस से सबको रिहाई

खड़ा आँधियों में अकेला ये दीपक
अंधेरों से लड़ना सिखाता है दीपक
मुश्किलों से डरना नहीं मेरे भाई

बुझी है जो बाती उन्हें फिर जलाएँ
मिटे आह पीड़ा, जलें हर बलाएँ  
तहे दिल से देते हैं सबको बधाई 

हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)