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Monday, 11 February 2019
Thursday, 7 February 2019
Monday, 4 February 2019
जीवन : तीन सेदोका
(एक)
रात अँधेरी
कान्तिमय दीपक
कंपित प्रज्वलित
खड़ा अकेला
सुख-दुःख संताप
लड़ना चुपचाप
(दो)
सृजन सीख
ठूंठ पर कोपल
दुःख पे सुख जय
आवाजाही है
पतझड़ वसंत
हंसते रोते जन
(तीन)
लघु जीवन
कंटकित डगर
कोशिशें बेअसर
व्यथित मन
हारे बैठे क्यूँ
भला
सीखें जीने की कला
[सेदोका जापानी
कविता की एक शैली है]
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
Sunday, 14 October 2018
विवशता
एक के बाद एक
फँसते जा रहे हैं
हम
समस्याओं के,
दुर्भेद
चक्रव्यूह में
चाहते हैं,
चक्रव्यूह से
बाहर निकल,
मुक्त हो जाएँ हम
भी
रोज प्रत्यंचा चढ़
जाती है,
लक्ष्य बेधन के
लिए
लेकिन असमर्थताएँ
परास्त कर जाती
हैं
हर तरफ से।
शायद-
हो गये हैं हम भी,
अभिमन्यु की तरह।
काश,
इससे निकलने का भेद भी
बतला ही दिया
होता
अर्जुन ने ।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
Thursday, 24 May 2018
भीड़ का रहनुमा
वह रहता है हरदम
युवाओं के कंधे पर सवार
रचता है मन्त्र उन्माद का और
फूँक देता है क्षुब्ध नौजवानों के कानों में
वह करता है
आदमी को उन्मादी भीड़ में तब्दील
हाँक कर ले जाता है अपना शिकार
रचता है मन्त्र उन्माद का और
फूँक देता है क्षुब्ध नौजवानों के कानों में
वह करता है
आदमी को उन्मादी भीड़ में तब्दील
हाँक कर ले जाता है अपना शिकार
बनाता है हथियार
वह करता है कातिलों का झुंड तैयार
बनाता है भय का माहौल
वह करता है ऐसा प्रबन्ध कि
हो जाये तहस नहस सब कुछ
समाज, विचार और सम्वेदना
वह कब्जा कर लेता है
बुद्धि और विवेक पर
वह करता है कातिलों का झुंड तैयार
बनाता है भय का माहौल
वह करता है ऐसा प्रबन्ध कि
हो जाये तहस नहस सब कुछ
समाज, विचार और सम्वेदना
वह कब्जा कर लेता है
बुद्धि और विवेक पर
मुश्किल है निकल पाना उनका
जो शामिल हैं भीड़ में, झुंड में
छीन लिया जाता है उनसे
सोचने, समझने का सामर्थ्य
भीड़ बन करते हैं लोग अपराध
बन जाते हैं वहशी और क्रूर
नाचते हैं अदृश्य इशारों पर
वीभस्त होता है भीड़ का चेहरा
घूमता हैं सभ्य मुखौटे में
भीड़ का अदृश्य रहनुमा
छिपा लेता है खुद को
हिंसक भीड़ की आड़ में
रगो में दौड़ती है उसकी
अमानुषिक बर्बरता।
जो शामिल हैं भीड़ में, झुंड में
छीन लिया जाता है उनसे
सोचने, समझने का सामर्थ्य
भीड़ बन करते हैं लोग अपराध
बन जाते हैं वहशी और क्रूर
नाचते हैं अदृश्य इशारों पर
वीभस्त होता है भीड़ का चेहरा
घूमता हैं सभ्य मुखौटे में
भीड़ का अदृश्य रहनुमा
छिपा लेता है खुद को
हिंसक भीड़ की आड़ में
रगो में दौड़ती है उसकी
अमानुषिक बर्बरता।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
Tuesday, 14 March 2017
Thursday, 4 February 2016
Thursday, 10 December 2015
रहो खुश हमेशा दुआ यह हमारी
Tuesday, 3 November 2015
ज़िंदगी
[आज इस 'ब्लॉग' के दो वर्ष पूरे हो गए। इन दो वर्षों में आप लोगों का जो स्नेह और सहयोग मिला, उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया और आभार। यूँही आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे यही चाह है। इस मौक़े पर एक कविता आप सब के लिए। सादर,]
पहली बारिश में
चट्टानों के नीचे
दबी हुई बीजों से
फूटते हैं अंकुर
ज़र्ज़र इमारतों की
भग्न दीवारों के
बीच उग आते हैं
पीपल और बरगद
वासंती छुवन से
निष्प्राण शाखों पे
फूटने लगती हैं
नई-नई कोंपलें
हर रोज, हर रात
जोशों-खरोस से
जूझते हैं मौत से
सैकड़ों कीट-पतंगे
ईटों-गारों के बीच
पलती हैं चींटियाँ
तपती मरूभूमि में
खिलता है कैक्टस
मौत की वीरानियों में
करवट लेता है जीवन
अथाह पीड़ा के बाद
मुस्कुराती है ज़िंदगी।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
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