जन-जन में है बेबसी, बदतर हैं हालात।
कैसा अबुआ राज है, सुने न कोई बात।।
उजड़ गयीं सब बस्तियाँ, घाव बना नासूर।
विस्थापन का दंश हम, सहने को मजबूर।।
जल, जंगल से दूर हैं, वन के दावेदार।
रोजी-रोटी के लिए, छूटा घर संसार।।
अब तक पूरे ना हुए, बिरसा के अरमान।
शोषण-पीड़ा है वही, मिला नहीं सम्मान।।
अस्थिरता, अविकास से, बदली ना तक़दीर।
बुनियादी सुविधा नहीं, किसे सुनाएँ पीर।।
सामूहिकता, सादगी और प्रकृति के गान।
नए दौर में गुम हुई, सब आदिम पहचान।।
भ्रष्ट व्यवस्था ने रचे, नित नए कीर्तिमान।
सरकारें आयीं-गयीं, चलती रही दुकान।।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
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