सुना था बुजुर्गों से
बचपन में हमने कि
खाली दिमाग शैतान का घर
इस फ़लसफ़े को गढ़नेवाले
या फिर इसे कहनेवाले
भूल गये होंगे यह बताना
या विचारा नहीं होगा कि
खाली पेट शैतान का घर
क्योंकि खाली पेट में भी
बसता है एक शैतान
जो भारी पड़ता है
खाली दिमागवाले शैतान पर
भूख की ज्वाला में
झुलस जाती है संवेदनाएँ
सारे आदर्श, सारे ईमान
भूल जाता है इंसान
सारे मान-अभिमान
कायदे-कानून, बुरा-भला
नैतिकता, हर फ़लसफ़ा
अभावों के जीवाणु
हर पल करवाते है
हालात से समझौता
भूख ने ही बनाया था
आदि मानव की खानाबदोश
तिल-तिल जलने की पीड़ा
निगल जाती है आदमीयत
खत्म हो जाती है फिर
सोचने-समझने की शक्ति
आदमी हो जाता है तैयार
पशुवत जीने के लिए
क्षुधा मिटाने की खातिर
बन जाता है वह खतरनाक
भर जाता है उसमें वहशीपन
भोजन के अलावा नहीं है
भूख का कोई विकल्प
पापी पेट के लिए
क्या-क्या नहीं करता है
इंसान
जब भूख ने किया था परेशान
विश्वामित्र ने खाया था
श्वान
भूख आदमी को
बना देती है लाचार
करवाती है अपराध
मंगवाती है भीख
बिकवाती है ज़िस्म
नहीं कर सकता कोई
भूख की अवहेलना
क्योंकि मरने से अधिक
श्रेयस्कर है जीते रहना।
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)