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Wednesday, 4 February 2015

संघर्षधर्मिता

तेज धूप का
सामना कर झुलसने
लगती है हरी घास
पल-पल सहती है
घोर यातनाएँ
लगातार रौंदे जाने से
वह पड़ जाती है जर्द
अपना अस्तित्व
बचाने की कोई सूरत
नजर नहीं आती
फिर भी वह जूझती
पूरे सामर्थ्य के साथ

अंततः उसकी
धमनियों में
बची रहती है
धुंधली सी संभावना
फिर से उभरती है
नई हरीतिमा
और
मुश्किलों से वहीँ फिर से
पनप उठती है हरियाली
जो गवाह है उसकी
संघर्षधर्मिता की
यही है सच्चाई
जीजिविषा कभी मरती नहीं
उदाहरण है सामने

निष्ठुर पतझड़ के बाद
फिर आता है वसंत
झुलसती गर्मी के बाद
घिरता है मेघ
होती है झमाझम वृष्टि
ठूंठ शाखों पर
फूटती हैं नयी कोंपलें
फैल उठती है हवा में
मिट्टी की सोंधी महक
(कैंसर से जूझते हुए)


कैंसर से डरे नहीं, लड़ें 


© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)