Sunday, 8 May 2016

रब से ऊपर होतीं माएँ


दिल की बातें पढ़तीं माएँ
दर्द भले हम लाख छुपाएँ

रहती हरदम साथ दुआएँ
हर लेती सब कष्ट बलाएँ

नाम कई एहसास वही है
इक जैसी होती सब माएँ

फ़ीके लगते चाँद सितारे
माँ के जैसा कौन बताएँ

सारी पीड़ा हँस के सहती
कर देती माँ माफ़ ख़ताएँ

माँ का रिश्ता सबसे प्यारा
रब  से  ऊपर होतीं माएँ

ममता का कोई मोल नहीं
कैसे माँ का क़र्ज़ चुकाएँ

© हिमकर श्याम

(तस्वीर और रेखाचित्र मेरे भाँजे अंशुमान आलोक की)

Sunday, 24 April 2016

मुकम्मल बादशाई चाहता हूँ


मिटाना हर बुराई चाहता  हूँ 
ज़माने की भलाई चाहता हूँ

तेरे दर तक रसाई चाहता हूँ
मैं  तुझसे आशनाई चाहता हूँ

लकीरों से नहीं हारा अभी मैं 
मुक़द्दर से लड़ाई  चाहता  हूँ

दिलों के दरमियाँ बढ़ती कुदूरत
मैं थोड़ी अब  सफाई चाहता हूँ

हुआ जाता हूँ मैं मुश्किल पसंदी
नहीं  अब  रहनुमाई  चाहता  हूँ

पलटकर  वार  करना  है  जरूरी
मैं अब  जोर आज़माई चाहता हूँ

तेरी खामोशियाँ खलने  लगी है
कहूँ क्या लब कुशाई चाहता हूँ

खुदा से और क्या माँगू भला मैं 
ग़मों  से कुछ  रिहाई चाहता हूँ

गदाई अब नहीं मंज़ूर हिमकर
मुकम्मल  बादशाई चाहता हूँ

© हिमकर श्याम

Friday, 8 April 2016

नूतन नवल उमंग

[नव संवत्सर और सरहुल पर दोहे ]

नव संवत्, नव चेतना, नूतन नवल उमंग।
साल पुराना ले गया, हर दुख अपने संग।।

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, वासन्तिक नवरात।
संवत्सर आया नया, बदलेंगे हालात।।

जीवन में उत्कर्ष हो, जन-जन में हो हर्ष।
शुभ मंगल सबका करे, भारतीय नव वर्ष।।


ढाक-साल सब खिल गए, मन मोहे कचनार।
वन प्रांतर सुरभित हुए, वसुधा ज्यों गुलनार।।

प्रकृति-प्रेम आराधना, सरहुल का त्योहार।
हरी-भरी धरती रहे, सुख-संपन्न घर बार।।

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)