पाया न अपने आप को पहचान आदमी।
है अक्स अपना देख के हैरान आदमी।
बस दूसरों के ऐब दिखाता है हर कोई,
कब झाँकता है अपना गिरेबान आदमी।
दुनिया सिमट गई है मगर दूरियाँ बढ़ीं,
है दोस्तों के हाल से अनजान आदमी।
इंसानियत से दूर है इंसान इन दिनों,
ईमान बेच कर बना शैतान आदमी।
होता है रोज़ -रोज़ मुसीबत का सामना,
अनजान मरहलों से परेशान आदमी।
बे-वज़्ह जल रही है गरीबों की बस्तियाँ,
मत सेंक इसमें हाथ ए' नादान आदमी।
आती नहीं कहीं से ठहाकों की अब सदा,
होंटो पे नक़ली ओढ़ ली मुस्कान आदमी।
हिंदू भी ख़ौफ़ में हैं, मुसलमाँ भी ख़ौफ़ में,
दैर-ओ-हरम में छुप गया हैवान आदमी।
दैरो-हरम : मंदिर-मस्जिद
© हिमकर श्याम
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)