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Wednesday, 5 May 2021

बहरे शाह वज़ीर

 


हवा विषैली हर तरफ़, मचा रही उत्पात।
क्रूर काल पहुँचा रहा, अंतस् को आघात।।
 
महामारी विकट हुई, बनी गले की फाँस।
हाँफ रही है ज़िंदगी, उखड़ रही है सांस।।

चूक आकलन में हुई, मचा हुआ कुहराम।
हाल बुरा है देखिए, सिस्टम है नाकाम।।
 
सत्ता पाने के लिए, नेता हुए अधीर।
कोरोना का भय नहीं, घूम रहे हैं वीर।।
 
बस चुनाव की फ़िक्र में, शासक हैं मशगूल।
हर दिन ही वो तोड़ते, अपने नियम उसूल।।
 
मतलब अपना साध कर, बैठे आँखें फेर।
कैसे बचे यकीन अब, चारों ओर अँधेर।।

त्राहि-त्राहि हर ओर है, सुने न कोई पीर।
सत्ता बहरी हो गई, बहरे शाह वज़ीर।।
 
प्राण-वायु को रोक कर, क़ीमत रहे वसूल।
ज़हर बाँटते जो रहे, उनसे आस फ़ुज़ूल।।

                                                                © हिमकर श्याम

                                                              (चित्र गूगल से साभार)

                                                                      
                                                                     

Tuesday, 3 November 2015

ज़िंदगी

[आज इस 'ब्लॉगके दो वर्ष पूरे हो गए। इन दो वर्षों में आप लोगों का जो स्नेह और सहयोग मिलाउसके लिए तहे दिल से शुक्रिया और आभार। यूँही आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे यही चाह है। इस मौक़े पर एक कविता आप सब के लिए सादर,] 


पहली बारिश में
चट्टानों के नीचे
दबी हुई बीजों से
फूटते हैं अंकुर

ज़र्ज़र इमारतों की
भग्न दीवारों के
बीच उग आते हैं
पीपल और बरगद

वासंती छुवन से
निष्प्राण शाखों पे
फूटने लगती हैं
नई-नई कोंपलें

हर रोजहर रात
जोशों-खरोस से
जूझते हैं मौत से 
सैकड़ों कीट-पतंगे

ईटों-गारों के बीच
पलती हैं चींटियाँ
तपती मरूभूमि में
खिलता है कैक्टस

मौत की वीरानियों में
करवट लेता है जीवन  
अथाह पीड़ा के बाद
मुस्कुराती है ज़िंदगी।

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)