तमाशा जात मज़हब का, खड़ा करना बहाना है सभी नाकामियाँ अपनी उन्हें यूँ ही छुपाना है
ढ़ले सब एक साँचे में, नहीं कोई अलग लगता मुखौटों में छुपे चेहरे, ज़माने को दिखाना है
है सारा खेल कुरसी का, समझते क्यूँ नहीं लोगो लगा के आग नफ़रत की, उन्हें बस वोट पाना है
बदल जाती हैं सरकारें मगर सब कुछ वही रहता हमें तो पाँच सालों में मुक़द्दर आजमाना है
हमारे मुल्क़ की हालत बना दी क्या सियासत ने सियासी पैंतरे सारे, हमी पर आज़माना है
अभी तो राख़ में चिंगारियाँ बाक़ी बहुत हिमकर जलेंगी बस्तियाँ कितनी, हमें मिलकर बुझाना है
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)
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