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Sunday, 13 March 2016

तमाशा जात मज़हब का खड़ा करना बहाना है



तमाशा जात मज़हब काखड़ा करना बहाना है
सभी  नाकामियाँ अपनी  उन्हें  यूँ  ही छुपाना है

ढ़ले सब एक  साँचे मेंनहीं  कोई अलग लगता
मुखौटों  में  छुपे  चेहरे,  ज़माने को  दिखाना है

है सारा खेल कुरसी कासमझते क्यूँ नहीं लोगो
लगा के आग नफ़रत कीउन्हें बस वोट पाना है

बदल जाती हैं सरकारें मगर सब कुछ वही रहता
हमें  तो  पाँच  सालों  में  मुक़द्दर  आजमाना  है

हमारे मुल्क़ की हालत बना दी क्या सियासत ने
सियासी  पैंतरे   सारे,  हमी   पर  आज़माना  है

अभी तो राख़ में चिंगारियाँ बाक़ी बहुत हिमकर
जलेंगी बस्तियाँ कितनीहमें मिलकर बुझाना है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)