रवानी गर नहीं हो तो नदी अच्छी नहीं लगती
कोई फ़ितरत बदलती चीज़ भी अच्छी नहीं लगती
जहाँ इंसानियत के नाम पर कुछ भी नहीं बाक़ी
वहाँ तहज़ीब की बेचारगी अच्छी नहीं लगती
छलकते बाप के आँसू, सिसकती रात भर अम्मा
बुढ़ापे में किसी की बेबसी अच्छी नहीं लगती
बुढ़ापे में किसी की बेबसी अच्छी नहीं लगती
कहीं पे जश्न का आलम, कहीं पे मुफ़लिसी तारी
चराग़ों के तले यह तीरगी अच्छी नहीं लगती
चराग़ों के तले यह तीरगी अच्छी नहीं लगती
खिलौनों की जगह हाथों में बच्चों के कटोरे हैं
किसी मासूम आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती
किसी मासूम आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती
कभी जो साथ रहते थे, हुए हैं दूर वो मुझसे
मुझे यूँ दोस्तों की बेरुख़ी अच्छी नहीं लगती
मुझे यूँ दोस्तों की बेरुख़ी अच्छी नहीं लगती
तुम्हारी याद में अक्सर मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ
जमाने को मेरी ये बे-ख़ुदी अच्छी नहीं लगती
जमाने को मेरी ये बे-ख़ुदी अच्छी नहीं लगती
© हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)