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Thursday, 25 March 2021

अच्छी नहीं लगती



 


 रवानी गर नहीं हो तो नदी अच्छी नहीं लगती
कोई फ़ितरत बदलती चीज़ भी अच्छी नहीं लगती

जहाँ इंसानियत के नाम पर कुछ भी नहीं बाक़ी
वहाँ तहज़ीब की बेचारगी अच्छी नहीं लगती

छलकते बाप के आँसू, सिसकती रात भर अम्मा
बुढ़ापे में किसी की बेबसी अच्छी नहीं लगती

कहीं पे जश्न का आलम, कहीं पे मुफ़लिसी तारी
चराग़ों के तले यह तीरगी अच्छी नहीं लगती

खिलौनों की जगह हाथों में बच्चों के कटोरे हैं
किसी मासूम आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती

कभी जो साथ रहते थे, हुए हैं दूर वो मुझसे
मुझे यूँ दोस्तों की बेरुख़ी अच्छी नहीं लगती

तुम्हारी याद में अक्सर मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ
जमाने को मेरी ये बे-ख़ुदी अच्छी नहीं लगती

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)


Sunday, 26 April 2020

हर दिन हुआ इतवार है


यूँ लगे हर दिन हुआ इतवार है
ज़िन्दगी की थम गई रफ़्तार है

ढूँढता था दिल कभी फ़ुर्सत मिले
फ़ुर्सतों ने कर दिया बेज़ार है

है यही बेहतर कि हम घर में रहें
कर रही क़ातिल हवा बीमार है

सरहदों के फ़ासलें मिटते गए
पास आने से मगर इनकार है

एक वबा ने हाल ऐसा कर दिया
क़ैद होकर रह गया संसार है

गुम हुई अफ़वाह में सच्ची ख़बर
चार सू अब झूट का व्यापार है

वह दिखाता है तमाशा बारहा
इक मदारी बन गया सरदार है

सड़कें सूनी, साफ़ नदियाँ-आसमाँ
चहचहों से फिर फ़ज़ा गुलज़ार है


वबा : महामारी 

© हिमकर श्याम 


(चित्र गूगल से साभार)


Wednesday, 22 May 2019

लिख रहे कैसी कहानी मुल्क में


लिख रहे कैसी कहानी मुल्क में
कर रहे जो हुक्मरानी मुल्क में

क़द्र खोती ये सियासत देखिए
आम होती बदजुबानी मुल्क में

मुफ़लिसी, बेरोजगारी बढ़ रही
रक़्स करती ख़ुश-गुमानी मुल्क में

अब भरोसा उठ गया है न्याय से
हाए इकतर्फ़ा बयानी मुल्क में

ख़ौफ़  का माहौल ऐसा बन गया
अब न होती हक़ बयानी मुल्क में

आँख से पट्टी हटा कर देखिए
क्या फ़ज़ाएँ शादमानी मुल्क में


कम नहीं हैं ज़ीस्त की दुश्वारियाँ  
आफ़तें कितनी उठानी मुल्क में

प्यार कितना है वतन से बोलिए
चाहिए इसकी निशानी मुल्क में

© हिमकर श्याम



(चित्र गूगल से साभार)



Thursday, 14 February 2019

हिज्र की रात तो ढली ही नहीं



हिज्र  की रात तो ढली ही नहीं
वस्ल की  आरज़ू गई ही नहीं

मेरे दिल में थी बस तेरी चाहत
आरजू  और कोई थी  ही नहीं

मैंने तुझको  कहाँ  नहीं  ढूँढा
यार तेरी ख़बर मिली ही नहीं

इश्क़ से थी हयात में लज़्ज़त
ज़िन्दगी बाद तेरे जी ही नहीं

मिन्नतें इल्तिज़ा  न कम की थी
बात लेकिन कभी सुनी ही नहीं 

काश कोई सुराख़ मिल जाये
बंद कमरे में  रोशनी ही नहीं

उससे कोई  उमीद मत रखना
वो भरोसे का आदमी ही नहीं

हर जगह देखता तेरी सूरत
फ़िक़्र से दूर तू गई ही नहीं

इक अज़ब सा सुकूत है  हिमकर
बात बिगड़ी तो फिर बनी ही नहीं


© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)


Thursday, 16 August 2018

हजारों रंग ख़ुशबू से बना गुलदान है भारत


हज़ारों रंग ख़ुशबू से  बना गुलदान है भारत
कई तहज़ीब,भाषा,धर्म की पहचान है भारत

कहीं गिरजा, कहीं मस्जिद, शिवाला और गुरुद्वारा
कभी होली कभी क्रिसमस कभी रमज़ान है भारत

कोई नफ़रत भी बोता तो पनपती है मोहब्बत ही
अज़ब जादू है माटी में, कोई वरदान है भारत

चलो मिलकर बचाएँ हम इसे फ़िरक़ापरस्ती से
न तेरा है, न मेरा है हमारी जान है भारत

नहीं पूरे हुए सपने, करे उम्मीद भी कब तक
मचलता है जो सीने में वही अरमान है भारत

इसे सींचा लहू देकर भगत अशफाक़ बिस्मिल ने
पुराणों वेद की धरती जहाँ की शान है भारत

ये वहशी दौर है 'हिमकर' नहीं महफ़ूज़ है कोई
हवाएँ  देख  नफ़रत की बहुत हैरान है भारत 

© हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)

Tuesday, 24 April 2018

बलवाइयों में लोग


मसरूफ़ आप में हैं, कहाँ फुर्सतों में लोग
बस कहने को बचे हैं शनासाइयों में लोग

उकता गये हैं रोज के इन हादसों से अब
डूबे हुए हैं ख़ौफ़ की गहराइयों में लोग

आँखों में ख़्वाब और थे, ताबीर और है
सपने बिखरते देख के मायूसियों में लोग

तदबीर से नसीब बदल कर नहीं देखे
तक़दीर कोसते रहे दुश्वारियों मे लोग

मजबूरियाँ तो हर तरफ़ आती यहाँ नज़र
हैरत से देखता हूँ बड़ी मुश्किलों में लोग

सारा सुकून छीन गया चैन अब किसे
आता नहीं क़रार, परेशानियों में लोग

गंग-ओ- जमन रवायतें जाने किधर गयीं
रिश्तों में तल्खियाँ हैं, फँसे साजिशों में लोग

कितना अज़ीब दौर है अहसास मर चुका
फ़ित्ने फ़साद बढ़ रहे,बलवाइयों में लोग

अफ़सोस है यही कि कोई बोलता नहीं
चुपचाप क्यूँ खड़े हैं तमाशाइयों में लोग

दुनिया को देख ले कभी हिमकर करीब से
सबकुछ गवाँ के बैठे हैं रंगीनियों में लोग

© हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)


Sunday, 17 December 2017

ख़्वाब सुनहरे बेचा कर


नाकामी  पर  परदा  कर
जनता को भरमाया कर


जब  मुद्दों  की  बात  उठे
मज़हब में उलझाया कर


भूखों  की  तादाद  बढ़ी
खुशहाली का दावा कर


सीधे  साधे  लोग   यहाँ
ख़्वाब सुनहरे बेचा कर


लफ़्फ़ाज़ी  का  राजा  तू
जुमले  यूँ  ही  फेंका कर


जो भी  तुझसे  प्रश्न  करे
उसके मुँह पर ताला कर


बेबस  चीखें   कहती   हैं
ज़ुल्म न हमपे इतना कर



(चित्र गूगल से साभार)

© हिमकर श्याम

Friday, 3 November 2017

सब्र किस दर्जा काम आता है

[आज इस 'ब्लॉग' के चार वर्ष पूरे हो गए। इन चार वर्षों में आप लोगों का जो स्नेह और सहयोग मिला, उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया और आभार। यूँही आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे यही चाह है। इस मौक़े पर एक ग़ज़ल आप सब के लिए। सादर,] 


 

हर  क़दम  हौसला  बढ़ाता है
सब्र किस दर्जा काम आता है

ख्वाब देखूँ तो किस तरह देखूँ
नींद  से  रोज़  वो  जगाता  है

जिस ने मेरा मकाँ जलाया था
आज वो  अश्क़ भी बहाता है

उस की रहमत पे  है नज़र वर्ना
साथ मुश्किल में कौन आता है

काटिए मत  हरा  शजर   ऐसे
धूप  में सब के  काम आता है

हादसे   ख़ुद  नज़र बचाते हैं
मौत से आँख जो मिलाता है

अपने बाज़ू पे रख यक़ीँ हिमकर
जीस्त  का  बोझ  जो  उठाता है

जीस्त : ज़िंदगी

© हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)